चुनावी मैदान में महिला वोटर बनीं सबसे बड़ा फैक्टर
छत्तीसगढ़ का सियासी महासंग्राम: आरक्षण, अधिकार और 'महतारी' के वोट पर टिकी सत्ता की दावेदारी
रायपुर| लोकसभा में संशोधन बिल गिरने के बाद छत्तीसगढ़ की राजनीति में 'हाई-वोल्टेज' आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। आगामी 30 अप्रैल को होने वाला विधानसभा का विशेष सत्र इस जुबानी जंग का मुख्य केंद्र बनने जा रहा है।
भाजपा की रणनीति: 'निंदा प्रस्ताव' से कांग्रेस की घेराबंदी
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार ने 30 अप्रैल का विशेष सत्र बुलाकर यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वे इस मुद्दे को जन-आंदोलन बनाने की तैयारी में हैं।
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सीधा हमला: भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस ने सदन में बिल का विरोध कर यह साबित कर दिया है कि उनकी प्राथमिकता महिला सशक्तिकरण नहीं, बल्कि राजनीति है।
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परिवारवाद पर तंज: भाजपा नेताओं का कहना है कि विपक्षी दल में महिलाओं का सम्मान केवल एक परिवार तक सीमित है।
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उद्देश्य: विशेष सत्र में 'निंदा प्रस्ताव' लाकर भाजपा कांग्रेस को सार्वजनिक रूप से 'महिला आरक्षण विरोधी' घोषित करने की कोशिश करेगी।
कांग्रेस का पलटवार: 'वादों के हिसाब' से भाजपा की घेरेबंदी
दूसरी ओर, कांग्रेस बैकफुट पर जाने के बजाय भाजपा के शासनकाल के अधूरे वादों की फेहरिस्त लेकर मैदान में उतर गई है। कांग्रेस के रणनीतिकार अब सीधे 'रसोई और जेब' के सवाल पूछ रहे हैं:
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महतारी वंदन योजना: कांग्रेस का बड़ा सवाल है कि यदि वादा सभी विवाहित महिलाओं को लाभ देने का था, तो वर्तमान में 40% पात्र महिलाएं इस लाभ से वंचित क्यों हैं?
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महंगाई का मुद्दा: 500 रुपये में गैस सिलेंडर देने का वादा क्या केवल सत्ता पाने का माध्यम था?
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अनियमित कर्मचारियों का दर्द: रेडी-टू-ईट कामगारों, रसोइयों की रुकी हुई वेतन वृद्धि और अनियमित कर्मचारियों के नियमितीकरण पर सरकार की चुप्पी को कांग्रेस बड़ा मुद्दा बना रही है।
निर्णायक मोड़ पर 'महिला वोट बैंक'
छत्तीसगढ़ में महिला मतदाता अब मूक दर्शक नहीं, बल्कि चुनाव का परिणाम बदलने वाली शक्ति बन चुकी हैं। भाजपा जहाँ 'आरक्षण और भविष्य के विजन' के जरिए महिला गौरव को साधने की कोशिश कर रही है, वहीं कांग्रेस 'महंगाई और अधूरे आर्थिक वादों' को ढाल बनाकर वर्तमान सरकार की साख पर चोट कर रही है।

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