मऊगंज | मऊगंज जिले के ग्राम पंचायत सीतापुर में हालात तेजी से बिगड़ते जा रहे हैं। एक दशक पुराना जमीनी विवाद अब इस कदर उग्र रूप ले चुका है कि गांव में डर और तनाव का माहौल बना हुआ है। दो पक्ष आमने-सामने हैं और स्थिति कभी भी खूनी संघर्ष में बदल सकती है। बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद ही जागेगा?

10 साल से फाइलों में दफन इंसाफ

हैरत की बात यह है कि यह विवाद पिछले 10 वर्षों से राजस्व विभाग की फाइलों में दबा पड़ा है। तहसील और राजस्व अधिकारियों की लापरवाही का आलम यह है कि आज तक न तो सीमांकन हुआ और न ही स्पष्ट निर्णय लिया गया। दोनों पक्ष अपनी-अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं, लेकिन विभाग की टालमटोल नीति ने हालात को विस्फोटक बना दिया है।

थाने में ‘कानून’ नहीं, ‘रिश्तेदारी’ हावी?

ग्रामीणों का आरोप है कि स्थानीय थाने में तैनात कुछ जिम्मेदार अधिकारी कानून से ज्यादा रिश्तेदारी निभा रहे हैं। एक पक्ष को खुला संरक्षण दिया जा रहा है, जबकि दूसरे पक्ष की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। समझाइश के नाम पर पक्षपात किया जा रहा है, जिससे तनाव और गहराता जा रहा है।

पत्रकार ने उठाया बड़ा सवाल

वरिष्ठ पत्रकार दीपक गुप्ता ने इस पूरे मामले पर सवाल उठाते हुए कहा—
“जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और रिश्तों की आड़ में न्याय का गला घोंटा जाए, तो गरीब और पीड़ित जनता आखिर जाए तो जाए कहां?”

‘गडर कांड’ की यादें फिर डराने लगीं

मऊगंज पहले ही ‘गडर कांड’ जैसे दर्दनाक हादसे का दंश झेल चुका है, जहां प्रशासनिक लापरवाही ने खूनी खेल को जन्म दिया था। सीतापुर के हालात भी अब उसी राह पर बढ़ते नजर आ रहे हैं। अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो इतिहास खुद को दोहरा सकता है।

24 घंटे में कार्रवाई की मांग

ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि

  • राजस्व विभाग 24 घंटे के भीतर जमीन की पैमाइश कर साफ फैसला करे

  • पुलिस दोनों पक्षों को सख्त चेतावनी दे

  • पुलिस अधीक्षक (SP) उन अधिकारियों पर कड़ी नजर रखें, जो थाने में बैठकर कानून के बजाय रिश्तेदारी निभा रहे हैं

फिलहाल सीतापुर गांव बारूद के ढेर पर बैठा है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन समय रहते हालात संभालता है या किसी बड़े कांड के बाद सिर्फ जांच के आदेश ही जारी किए जाएंगे।