मैहर। मैहर जिले के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अमरपाटन में अतिथि विद्वानों के मानदेय भुगतान को लेकर सामने आया वित्तीय घोटाला अब गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। हैरानी की बात यह है कि इस मामले को लेकर पूर्व में समाचार पत्रों में खबरें प्रकाशित होने के बावजूद उच्च शिक्षा विभाग द्वारा अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। इससे विभागीय उदासीनता और संरक्षण की आशंका और गहराती जा रही है।सूत्रों के अनुसार, महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य डॉ. एस.के. वर्मा द्वारा आयुक्त के स्पष्ट निर्देशों की अनदेखी करते हुए नियमों के विरुद्ध अतिथि विद्वानों को मानदेय का भुगतान किया गया। बताया जा रहा है कि अप्रैल और मई माह में कई अतिथि विद्वान महाविद्यालय में उपस्थित ही नहीं थे, इसके बावजूद उनके नाम से भुगतान दर्शाया गया। वहीं कुछ अतिथि विद्वान अन्य जिलों के महाविद्यालयों में चेक-अटैच होकर कार्यरत थे, फिर भी अमरपाटन महाविद्यालय से उन्हें भुगतान किया गया।गौरतलब है कि आयुक्त उच्च शिक्षा द्वारा स्पष्ट आदेश जारी किए गए थे कि बिना वास्तविक उपस्थिति और शैक्षणिक कार्य के किसी भी स्थिति में अतिथि विद्वानों को भुगतान नहीं किया जाएगा। इसके बावजूद भुगतान होना यह दर्शाता है कि आदेशों को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया या फिर जिम्मेदार अधिकारियों ने आंखें मूंद लीं।इस पूरे प्रकरण में अतिरिक्त संचालक, उच्च शिक्षा विभाग, रीवा संभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। संभागीय स्तर पर निगरानी और नियंत्रण की जिम्मेदारी होने के बावजूद इस तरह की गंभीर वित्तीय अनियमितताओं का समय रहते संज्ञान न लिया जाना विभागीय कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाता है। जानकारों का कहना है कि बिना किसी स्तर पर संरक्षण के इस प्रकार की अनियमितता संभव नहीं है।पूर्व में खबरें प्रकाशित होने के बाद भी यदि न तो जांच हुई और न ही किसी प्रकार की कार्रवाई, तो यह स्पष्ट करता है कि जिम्मेदार अधिकारी जवाबदेही से बचते रहे। इससे न केवल शासकीय धन का दुरुपयोग हुआ है, बल्कि उच्च शिक्षा विभाग की साख पर भी असर पड़ा है।स्थानीय नागरिकों और शिक्षाविदों ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराई जाए तथा प्रभारी प्राचार्य और अतिरिक्त संचालक, उच्च शिक्षा विभाग रीवा संभाग की भूमिका की गहन जांच कर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी वित्तीय अनियमितताओं पर रोक लगाई जा सके।अब देखना यह होगा कि उच्च शिक्षा विभाग इस गंभीर मामले को केवल औपचारिकता तक सीमित रखता है या फिर दोषियों पर कार्रवाई कर व्यवस्था में सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाता है।