सोमवार को सनावद में किसानों का आक्रोश सड़कों पर फूट पड़ा। कृषि उपज मंडी में कपास खरीदी को लेकर कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) द्वारा लागू किए गए सख्त स्लॉट बुकिंग नियमों और खरीदी सीमा में अचानक की गई कटौती से किसानों में भारी नाराजगी देखी गई। हालात उस समय बेकाबू हो गए जब शाम करीब चार बजे इंदौर–खंडवा–इच्छापुर–ऐदलाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग पर किसानों ने चक्काजाम कर दिया।किसानों का कहना था कि सीसीआई द्वारा तय स्लॉट से अधिक कपास खरीदी न करने तथा प्रति किसान खरीदी सीमा को पहले के 12 क्विंटल से घटाकर मात्र 5 क्विंटल 70 किलो कर देने का आदेश पूरी तरह किसान विरोधी है। इससे उनकी आर्थिक स्थिति पर सीधा असर पड़ रहा है। इसी के विरोध में सैकड़ों किसान ट्रैक्टरों के साथ सड़कों पर उतर आए। आंदोलन में राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ के कार्यकर्ताओं ने भी भाग लिया और सीसीआई पर गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगाए।प्रदर्शनकारियों ने हाईवे के बीचों-बीच ट्रैक्टर खड़े कर दिए, जिससे दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। ट्रक, कारें और दोपहिया वाहन घंटों तक जाम में फंसे रहे। स्थिति इसलिए और गंभीर हो गई क्योंकि सोमवार को साप्ताहिक बाजार का दिन था और आसपास के सैकड़ों गांवों से लोग खरीदारी के लिए सनावद पहुंचे हुए थे। इसके अलावा पीरनपीर शीतला माता का मेला भी चल रहा है, जिससे पहले ही यातायात का दबाव अत्यधिक था। जाम के कारण यात्रियों, व्यापारियों और आमजन को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा और व्यापारिक गतिविधियां पूरी तरह ठप हो गईं।सूचना मिलते ही तहसीलदार केशिया सोलंकी और थाना प्रभारी रामेश्वर ठाकुर मौके पर पहुंचे और किसानों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन किसान अपनी मांगों पर अड़े रहे। चक्काजाम के चलते शाम करीब छह बजे तक राष्ट्रीय राजमार्ग पर वाहनों की आवाजाही पूरी तरह बंद रही।अंततः सीसीआई अधिकारियों द्वारा यह आश्वासन दिए जाने के बाद कि मंडी में पहले से खड़े लगभग 250 वाहनों की कपास खरीदी पूर्व व्यवस्था के अनुसार ही की जाएगी, किसानों ने आंदोलन समाप्त किया और चक्काजाम हटा लिया। मंडी सचिव लक्ष्मण सिंह ठाकुर ने बताया कि सोमवार को आए सभी वाहनों की कपास खरीदी रात में ही पूरी कर ली गई है। वहीं मंगलवार से मंडी में आने वाले कपास वाहनों की खरीदी आगामी आदेश तक स्थगित रहेगी। वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशानुसार फिलहाल खरीदी व्यवस्था पूर्ववत जारी रहेगी और कोई नए नियम लागू नहीं किए जाएंगे।इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बिना पूर्व सूचना और संवाद के लिए गए प्रशासनिक निर्णय किस तरह किसानों के सब्र का बांध तोड़ देते हैं और आम जनता को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।