भिंड में प्रशासन साइलेंट, जनता की शिकायतें अनसुनी
भिंड। मध्य प्रदेश सरकार जहां जनहित और सुशासन के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं भिंड जिले में प्रशासनिक कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि जिले में आम जनता की सुनवाई लगभग ठप हो चुकी है। किसान, मजदूर और गरीब वर्ग अपनी समस्याओं को लेकर अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश करते हैं, लेकिन कलेक्टर कार्यालय तक उनकी आवाज नहीं पहुंच पा रही। लोगों का कहना है कि फोन लगाने पर या तो नंबर व्यस्त रहता है या फिर कोई जवाब नहीं मिलता, जिससे जनता खुद को असहाय महसूस कर रही है।जिले में फर्जी शस्त्र लाइसेंस के मामलों को लेकर भी प्रशासन की भूमिका सवालों के घेरे में है। आरोप है कि इन मामलों में न तो अब तक कोई ठोस कार्रवाई हुई और न ही सीबीआई जांच की मांग पर स्पष्ट रुख अपनाया गया। बताया जा रहा है कि मामले को लेकर उच्च अधिकारियों को पत्र लिखकर औपचारिकता निभाई गई, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात जस के तस बने हुए हैं। इससे लोगों में यह संदेश जा रहा है कि गंभीर मामलों में भी प्रशासन केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित है।वहीं सिंध क्षेत्र में अवैध उत्खनन और संदिग्ध गतिविधियों पर सख्ती न होना भी चर्चा का विषय बना हुआ है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यदि समय रहते प्रशासन ने प्रभावी कदम उठाए होते, तो स्थिति इतनी बिगड़ती नहीं। लगातार हो रही अनदेखी से प्रशासन की मंशा पर भी सवाल उठने लगे हैं।इस पूरी स्थिति का असर सरकार की छवि पर भी पड़ता दिख रहा है। भाजपा सरकार गरीबों, किसानों और मजदूरों के लिए कई योजनाएं चला रही है, लेकिन स्थानीय प्रशासन की सुस्ती के कारण उनका लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पा रहा। यहां तक कि भाजपा कार्यकर्ता और पदाधिकारी भी जनता के सवालों के जवाब नहीं दे पा रहे हैं।अब सवाल यह है कि क्या सरकार भिंड जिले में प्रशासनिक व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए सख्त कदम उठाएगी, या फिर सब कुछ यूं ही “साइलेंट मोड” में चलता रहेगा। भिंड की जनता अब सिर्फ आश्वासन नहीं, ठोस कार्रवाई और जवाब चाहती है।

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