मथुरा।
धर्मनगरी वृन्दावन में आयोजित सुदामा कुटी शताब्दी महोत्सव का शुभारंभ आध्यात्मिक गरिमा और वैचारिक संवाद के वातावरण में हुआ। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने समाज को जोड़ने वाला स्पष्ट और सारगर्भित संदेश दिया। उन्होंने संकेतों में कहा कि भारत की आत्मा को समझने की दृष्टि एक होनी चाहिए, क्योंकि देश के भीतर रहने वाले लोगों को जोड़ने वाली डोर एक ही है, जबकि बाहर से देखने वाले उसे अलग–अलग खांचों में बांटने का प्रयास करते हैं।अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि सामाजिक समरसता ही समाज और राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति है। जब समाज एक दिशा और एक विचार के साथ आगे बढ़ेगा, तब आने वाले समय में भारत की भूमिका वैश्विक मंच पर स्वतः सशक्त और प्रभावशाली होगी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि आंतरिक एकता बनी रही तो भविष्य की चुनौतियां स्वतः अवसर में परिवर्तित हो जाएंगी।संघ के कार्यों को परिवारबोध से जोड़ते हुए सरसंघचालक ने कहा कि समाज को जोड़ने की भावना ही संगठन की मूल प्रेरणा है। उन्होंने पूर्वजों द्वारा परंपराओं और मूल्यों की रक्षा के लिए दिए गए योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि आज उसी सांस्कृतिक धरोहर की गूंज विश्व पटल पर सुनाई दे रही है। राष्ट्र सेवा को उन्होंने साधना का स्वरूप बताते हुए कहा कि शक्ति का जागरण प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।कार्यक्रम में उपस्थित संत समाज की भूमिका को विशेष रूप से रेखांकित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि भक्ति और सेवा के मार्ग पर चलने वाला संत समाज समाज को दिशा देने का कार्य करता है। इसी कारण ऐसे आयोजनों में संतों की सहभागिता अत्यंत आवश्यक है।शुभारंभ अवसर पर सुदामा कुटी के महंत सुदीक्षक दास महाराज, ऋषि साध्वी ऋतंभरा, मलूक पीठाधीश्वर राजेंद्र दास महाराज, नाभा पीठाधीश्वर महंत सुतीक्ष्णदास महाराज सहित अनेक संतों के सानिध्य में दीप प्रज्ज्वलन किया गया। इस दौरान पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा, श्रद्धा और वैचारिक चेतना से ओतप्रोत दिखाई दिया।संतों ने अपने उद्बोधनों में कहा कि समाज की एकता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रभाव ही भारत की वास्तविक पहचान है, और ऐसे आयोजन समाज को आत्ममंथन तथा दिशा प्रदान करते हैं।कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं और साधु–संतों की बड़ी संख्या उपस्थित रही। शताब्दी महोत्सव के अंतर्गत आगामी दिनों में धार्मिक, सांस्कृतिक और वैचारिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।